
“प्रेम रस में कुछ ऐसे डूबी है ये कश्ती ए ज़िन्दगी, राह राही, मंज़िल मुकाम कुछ नजर ही नहीं आता कम्भख्त”
– पुष्पेंद्र राठी












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“प्रेम रस में कुछ ऐसे डूबी है ये कश्ती ए ज़िन्दगी, राह राही, मंज़िल मुकाम कुछ नजर ही नहीं आता कम्भख्त”
– पुष्पेंद्र राठी












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