बंजर पड़ी थी दिल की ये मट्टी
अरमां थे कि फिर गुलज़ार हों
ढूंढता फिरता था मैं नादान बहार को
कभी इस गली तो कभी उस गली
पुराने जख्म रिस्ते थे हुज़ूर
मगर दिल को यकीन भी था ज़रूर
बंजर मट्टी में गुलिस्तां खिलेगा
हमराही एक ना एक रोज़ मिलेगा
दबे पांव आयी जो तुम
बिना किसी दस्तक के
तोड़ डाले जिस्मानी ताले सारे
बरसों से जिसमें रूह क़ैद थी मेरी
गर्म तवे पे पानी डालो तो
धुआं सा जो उठता है
तुम्हारे प्यार की बूंदों ने
रूह से ऐसा ही बादल उड़ाया
दर्दो गम मिटते गए फिर
दिल ने फिर से नगमा गाया
तुमने ना थी वो आवाज़ सुनी कभी
सहम गई तुम अंजान सी
बंजर जिस्मानी मट्टी पर मुद्दत बाद
जब प्रेम बीज रोपा जाता है
थर्राती है रूह भी एक बार
उसी कंपन से ही गुल आता है
इस कंपन से, इस धड़कन से क्यूं तू भला डरती है
प्रणव शब्द से ही तो ये सारी सृष्टि चलती है
प्रेम का तू अलख बजने दे
इस कंपन से फिर गुल गुलज़ार खिलने दे…
– पुष्पेंद्र राठी









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