दिल ले चला है आज फ़िर
उस बेख़ौफ़ सी उड़ान पे,
उड़ता फिरूँ आज़ाद मैं
बेपरवाह इस जहान से
वो विशालकाय पर्वत तेरे
तेरी हसींन वो वादियाँ,
याद है हमको बख़ूबी
उस वादी से उठता धुँआ
कैसे करूँ बयाँ मैं तेरे
हुस्न को हिमालय,
हूर से भी ख़ूबसूरत
है तेरा ये गुलिस्तां
कभी हौले से हैं गुनगुनाते
होके मगन कभी नाचते गाते,
अपनी ही धुन में दीवाने से
चले जाते हैं दरिया तेरे
मदमस्त् है सतलुज कहीं
कहीं चेनाब बहती शान से,
कहीं झेलम की वो शोख़ियाँ
तो कहीं गंगा है उफान पे
कहीं मंदिर की वो घंटियाँ
कहीं मस्जिद से आती अजान,
ओम मणि पेदमें हूँ कहीं
कहीं एक ओंकार सुनते यहाँ
क्या ज़मीं है, क्या फ़लक
तेरी अलग ही बात है,
पूरी कायनात में हिमालय
तू ही तो सबसे ख़ास है
उस एक वादी में था घर मेरा
था ज़माने भर से मैं जुदा,
सराबोश तेरे नूर में
ख़ुशमिज़ाज से थे हम जिये,
कितने ही अँदाज तेरे
हर मौसम नये रँगों ढँग,
बेमिसाल रूप तेरा
शबो रोज़ हम देखा किए
रूह को मिले सुकून
हूँ मैं तुझसे रूबरू जहाँ,
तेरे ही दामन में आके
भाता है मुझको ये जहान
तुझसे ही ये ज़िंदगी है
तू ही है अपना जुनून,
जहाँ गुज़रे हैं वो पल हज़ारों
वो कैसे मैं बयाँ करूँ
रहूँ दूर तुझसे मैं सही
तेरी यादें तो मेरे पास हैं,
लम्हे जो गुज़रे हैं वहाँ
वो मुख़्तसर हैं साथ हैं
दिल ले चला है आज फिर
उस बेख़ौफ़ सी उड़ान पे,
उड़ता फिरूँ आज़ाद मैं
बेपरवाह इस जहान से…
– पुष्पेंद्र राठी







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