
वो बूझें हैं तू कौन है
तेरा धर्म क्या, तेरी जात क्या
रूतबा नहीं, रूपया नहीं
है तेरी भी औक़ात क्या
नाम, धर्म, जात, धन
बना रहे हैं जो मुद्दा
कैसे भला वो समझेंगे
सिद्धार्थ कैसे बना बुद्धा
सोचूँ मैं कि कैसे कहूँ
पर चुप भी मैं कैसे रहूँ
मेरी बेख़ुदी क्या समझेंगे
ख़ुद का ही जिनको इल्म नहीं
ज़र्रे जर्रे में है जो बसा
ख़ुद में ख़ुदी, ख़ुदी से ख़ुदा
ख़ुद से ही होकर रूबरू
जित देखूँ तित पाऊँ ख़ुदा
ईमान-ए-पैग़म्बर हूँ मैं
जज़्बा-ए-सिकंदर हूँ मैं
मर्यादा-ए-पुरुषोत्तम हूँ मैं
मुद्रा-ए-सर्वोत्तम हूँ मैं
वो देखे हैं पैग़म्बर को
मैं करता बुलंद इमान को
वो जाने हैं सिकंदर को
मैं जानूँ इम्तिहान को
वो पूजे हैं श्री राम को
मैं मानूँ कर्म महान को
शून्य से सब है शुरू
जोड़े जा मनचाहे अक्षर
साथ कुछ जाना नहीं
अंत में सिर्फ़ है सिफ़र
बात जो ये समझ गया
ख़ुशनुमा रहता उसका सफ़र
धूप में छांव में, शहर में गाँव में
सुख में दुख में, जीवन की हर रुत में
नर में नारी में, हर एक प्राणी में
सबको ख़ुद में, ख़ुद को सब में
जिसने है पहचान लिया
है उसने सदा पाया ईश्वर
ज़र्रे जर्रे में है जो बसा
ख़ुद में ख़ुदी, ख़ुदी से ख़ुदा
ख़ुद से ही होकर रूबरू
जित देखूँ तित पाऊँ ख़ुदा…
– पुष्पेंद्र राठी






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