For Palestine

आफ़ताब है रूह जब अपनी 

रोशन करते चलें चलो

उन मायूस स्याह गलियारों को 

आशियाँ है वहाँ भी मेरे यार का 

जहाँ देखूँ पाऊँ उसको वहाँ

चलो एक चराग जलायें वहाँ 

ग़मों अन्धेरों की है दहशत जहाँ 

घोंसले बचाने में सब मसरूफ 

अजब सी कश्मकश है वहाँ 

दौड़ते भागते परेशाँ से 

बदहवास बाशिंदे हैं बहुत 

नूर-ए-इलाहि का चलो 

थोड़ा रंग बिखेरें वहाँ 

बन साक़ी इश्क़ प्याले में 

सुकून की मय कुछ

उनको चलो पिलायें अब 

साक़ी ही चारागर है 

इश्क़ का ऐसा असर है 

हयात-ए-रंगोबू से तरबतर

हो जाएँ गलियाँ फिर से 

चैन बाँटे चलो थोड़ा 

उन बेक़रार बेज़ारों को 

आफ़त उनकी जो हो फ़ना 

ग़म तब्दील हो 

रौनक़े इश्क़ में वहाँ 

अँधेरा काफ़ूर हो जाए 

सब आफ़ताबी हों जहाँ 

सना नज़र आए जो सबको

हक़ का वजूद जानें वो तो 

आबाद गुलज़ार होने लगेगा 

बंजर बना मोहल्ला अपना 

दरख़्त बनेंगे बूटे एक रोज़

ख़ुशमिज़ाजी का आलम हो तो 

आफ़ताब है रूह जब अपनी 

रोशन करते चलें चलो

उन मायूस स्याह गलियारों को 

आशियाँ है वहाँ भी मेरे यार का 

जहाँ देखूँ पाऊँ उसको वहाँ…

– पुष्पेंद्र राठी


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