
बरसों पहले मेरे गाँव में
बूढ़े पीपल की छाँव में
ईद दिवाली सब मनती थी
कलियाँ हर बगिया खिलती थी
रूखी सूखी जैसी मिलती थी
रोटी पर सब में बँटती थी
एक रब के सब बन्दे सारे
नाम तरीक़े सबके न्यारे
गंगा जमुना तहज़ीब पुरानी
रिश्ते थे फ़क़त सुर्ख़ रूहानि
मंदिर मस्जिद में फ़र्क़ ना जाना
ऐसा था वो गुज़रा ज़माना
फिर ऐसा भी एक दौर आया
संग नफ़रत का सैलाब लाया
सत्ता वैभव की चाह में
सियासी एक उस दाँव ने
छोड़ इंसानी मझहब को
ईश्वर अल्लाह के नाम पे
अपनों को किया बेगाना
दो टुकड़े किए मेरे गाँव के
सियासत के तूफ़ान में
झूठे धर्म के गुमान में
खेल जो ख़ूनी चला
चलता ही रहा ये सिलसिला
ना जाने कितने जनाज़े उठे
कितनी ही लाशें बिछी
राजनीति ने फूँक डाली
पुरानी रीत थी जो प्रीत की
सरहदों में बाँटा उसको
बाग़बान था जो नूर का
बना दुश्मन हमसाया अपना
कल तक लगता था हूर सा
जिहाद के कभी नाम पे
कभी “मुक्ति” के रास्ते
धर्म कभी बिसात बने
कभी वतनपरस्ती के वास्ते
अवाम को गुमराह कर
गद्दी पाने का मोह ही
ख़ूनी राजनीति घिनोनी
वो करते हैं इस रोज़ भी
रसूख़दार साहूकार
सियासतों के राज़दार
महफ़ूज़ हैं घरों में अपने
सरहदों के आर पार
उनकी लगायी आग में
होते हैं हम रोज़ फ़ना
जिनका कुछ जाना नहीं
वो बैठे बनके सरगना
सरहद पार से आज फिर
मनहूस ख़बर आयी है
जनाज़े उठे हैं आज फिर
इधर हमने भी चिता जलायी है
आज फिर दहशत की वहशत
फिर लाल आज रूखसार है
नयी जंग की गुफ़्तगू से
बूढ़ा पीपल भी शर्मसार है
ख़ुश हैं मगर कुछ नासमझ
सत्ताधारी कुछ अंधे भक्त
लगे जंग जिनको खेल जैसी
ऐसे भी हैं कुछ कमबख़्त
घटें फ़ासले मिटें सरहदें
रूह को फिर आए सुकून
फिर से पूरा हो गाँव मेरा
ऐसा भी कुछ रखो जुनून
उस पार भी वो मुश्किलें हैं
उनके भी ये शिकवे गिले हैं
जिन परेशानीयों से है झूझता तू
उनको भी तो वो ग़म ही मिले हैं
इस नफ़रत की चिंगारी से
तेरा आशियाँ ना फिर ख़ाक हो
सियासतों का खेल है सब
ना भूलना इस बात को…
– पुष्पेंद्र राठी






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