
ग़ज़ब तमाशा, अजब कहानी
देखो रे भाई, सुनो ओ ज्ञानी
राह भी वो, राही है जो
खेल खिलाड़ी, दामन चोली
अंत भी वो, आरम्भ है जो
आँख मिचोली ऐसी हमजोली
सत से सत्य, सत्य की गाथा
नए रूप में गयी गढ़ी
चित्त की सूखी भूमि पर जब
चेतना की ओस गिरी
कालचक्र शुरू हुआ तब
चलने लगी फिर बंद घड़ी
निर्गुण ने त्रिगुण हैं धारे
साया अपना ख़ुद ही निहारे
माया का ये खेल अनोखा
कला, कलाकार और कृति
संवेदना की तरंगों से
चित्त में जागी ऐसे व्रति
प्रणव शब्द ने पंचतत्व बन
सृष्टि की संरचना की
पंचकोष में लिपटे चित्त से
है उपजी ऐसे प्रकृति
कालचक्र चलता चला यूँ
कोषों की परतें खुली
अणु अणु जुड़ने लगे तो
बने जीव जंतु, वनस्पति
खेल अदभुत, माया निराली
क्रम विकास से चलते चली
बुद्धि जब विकसित हुई तो
इंसान की ये जोनी मिली
माया का पर्दा उठाओ
समझो सत की प्रवृति
सत्य, अहिंसा, प्रेम भाव से
मुक्ति मिल हो सदगति
योग साधना, ज्ञान प्रकाश से
मार्ग दिखला गए गुरु ऋषि
शरीर है नश्वर, सृष्टि अनित्य
चित्त की समझो नियति
पत्थरों पे मत्था अपना
यहाँ वहाँ क्यूँ घिसता फिरे
मन ही मंदिर, प्रेम ही पूजा
स्वाध्याय से ज्ञान मिले
मूर्ति में भगवान दिखें तोहे
है पाखंड में उलझा हुआ
माथे तिलक भगवा चोगा
मन है ना पर सुलझा हुआ
निर्मल जो करे मन को तो
चित्त भी हो जाए शांत स्थिर
अपने भीतर ही ईश्वर पाए
काया भी फिर जाए निखर
सत से सत्य, सत्य की गाथा
गुरु, साधना से जानत पाए
दरिया मिले सागर में जैसे
तन मन का संगम हो जाए
ग़ज़ब तमाशा, अजब कहानी
देखो रे भाई, सुनो ओ ज्ञानी
अंत भी वो, आरम्भ है जो
आँख मिचोली ऐसी हमजोली…
– पुष्पेंद्र राठी








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