
मौला मौला, मेरे मौला
मौला ओ मौला
किस मुख से तेरी इबादत करूँ
ओ मेरे मौला
तेरी रंगोबू से सजी जो हयात थी
वो अब खाक होती जा रही है सुबह-शाम
हवा में जहर, पानी भी नापाक
धरती पे जंग, बेगैरत हो चुके हैं लोग तमाम
मादर-ए-वतन की इज़्ज़त अब शर्म से परे
“धर्म” के नाम बिकती है नफरत शबो सहर
दिल टूट जाता है, आह निकलती है हर रोज़
मौला मौला, ओ मेरे मौला
इश्क की तू फिर वो लौ जला
हक़ का फिर वो रुतबा बना, दिलों पे मरहम लगा
इस अंधेर नगरी में
रोशन कर दे फिर रूहों को
जहां है तेरा वजूद बसा
अल्लाह हू, अल्लाह हू, अल्लाह हू, अल्लाह
मौला, मेरे मौला
ओ मेरे मौला
ओ मेरे मुर्शिद मौला
कर दे ख़ाक नफ़्स को
क्या तेरा, क्या मेरा
जब ना था कुछ, तब भी तो था तू
तेरे रहम-ओ-करम से ही तो है दिल की ये जुस्तजू
जगा दे हर सोते इंसान को
मिटा दे फासले तमाम
इश्क में मुकम्मल इंसान करे हर काम
रंग, धर्म की सरहदों के पार
वो जो तेरा डेरा है
आएं हम भी उस धाम
मौला ओ मौला
ओ मेरे मुर्शिद मौला
इश्क की तू फिर लौ जला
तेरा मेरा जो वहम है इस बशर में
ला इंकलाब उसे ख़ाक कर
मौला मौला, ओ मेरे मुर्शिद मौला
आ फिर टूटे दिलों को आबाद कर
मौला मौला, मेरे मौला
मौला ओ मौला
अल्लाह हू, अल्लाह हू अल्लाह हू, अल्लाह
– पुष्पेन्द्र राठी











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