
दास्तान-ए-इश्क़ का
भी है अजीब फ़लसफ़ा,
बला भी दुआ लगे
हो मय्यत् भी एक जश्न सा
इश्क़बाज़ी में मुकम्मल
करते चलें हर काम को,
वफ़ा, बेवफ़ाई से परे
परवाज़ उसके नाम को
ग़म को दरकिनार कर
दूर कर शिकवा गिला,
भले का तो भला है ही
तू कर बुरे का भी भला
कुछ कुफ़्र से ख़यालात को
मैं ख़ाक आज करने चला,
हाथ थाम कर मेरा चल
तू भी इश्क़ की ये लौ जला
रूह की आयतों से
दिल की ख़्वाहिशों पे,
कायनात की किताब पे
बेनूर से उस ख़्वाब से
इश्क़बाज़ी में चला चल
लिखने एक अफसाना नया,
घूमता सा, झूमता सा
लायेगा तू एक ज़माना नया
दास्तान-ए-इश्क़ का
भी है अजीब फ़लसफ़ा,
बला भी दुआ लगे
हो मय्यत् भी एक जश्न सा
– पुष्पेंद्र राठी










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