Ode To Humankind

जंगल जंगल, पर्वत पर्वत

ढूँढे फिरे क्या दरबदर,

क़ाबा, काशी, मंदिर, मस्जिद 

सबकी ख़ाक छानता है,

भँवरों के जैसे फिरे फूलों पे

जाने क्या तलाशता है,

कस्तूरी सी वो गंध है तुझमें ही

ख़ुद को ही पर ना पहचानता है

क्यूँ है तू ऐसे खोया सा 

ख़ुद से ही रहता गुमशुदा,

अपने भीतर देखा नाहीं

बाहर ढूँढन चला ख़ुदा,

समंदर भी तू, पैग़म्बर भी तू 

मूसा भी तू, ईसा भी तू,

भक्ति भी तू, शक्ति भी तू 

है तुझमें ही रहता मुस्तफ़ा

खोल मन के ये कपाट

नेकि कर दरिया में डाल,

दे तोड़ माया के पिंजरे को 

ना दिल में रक्खि कोई मलाल,

ईश्वर, अल्लाह सब एक हैं 

नानक, बुद्धा भी यही कहत हैं,

सब हैं रचे उन्ही तत्वों से

है सबका ही लहू सुर्ख़ लाल

प्रेम ही बस धर्म है

अज्ञान ही अधर्म है,

प्रेम से ही मुक्ति मिले 

प्रेम ही सुकर्म है

सब एक हैं, जग एक है 

यही है सर्व धर्म व्याख्या,

काट कर, बाँट कर 

ना बदलो इसकी परिभाषा

जो तुझमें है, वो मुझमें है 

मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है

ज से जनम, ल से मृत्यु

जल ही तू जाने जीवन है,

धरती को कर निर्जल तू 

निर्लज बन कैसे जीवण है

जाके मंगल पे ढूँढ रहा 

कर अपना आशियाँ तबाह,

अब मंगल की भी ख़ैर नहीं 

अमंगलकारी फिर बना ख़ुदा

बूँद बूँद, क़तरा क़तरा

भरता ऐसे ही गागर है,

दूषित गंगा, प्रदूषण चहुं दिशा 

ना संभव पार अब भव सागर है

जल, वायु और भूमि का 

हमने कर दिया विनाश,

आसमाँ में फिर भी उड़ रहे 

करते नयी पृथ्वी तलाश

जो तोड़े है, वो मैं नाहीं

जो जोड़े है, मैं वो माही

जो करे इश्क़ शरीर से

वो देवदासी बने,

जो करे इश्क़ रूह से

वो हीर-रांझा मरासि बने,

जो करे इश्क़ मातृभूमि से

वो आज़ाद, भगत, खान भारतवासी बने

भूल कर मातृभूमि को

करे ग़ुलामी ग़ैरों की

वो नासमझ खलासी बने,

बन खलासी, कर सेवा 

पर याद रख ओ बेख़बर

सर्वप्रथम धरती माँ है,

इसी धरा पे तूने जनम लिया 

आख़िर यहीं पे होना फ़ना है

जो तोड़े है वो मैं नाहीं

जो जोड़े है मैं वो माही

जो तुझमें है, वो मुझमें है 

मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है।

Reduce, Reuse, Recycle, Restore, Replenish and Rejoice…

– पुष्पेंद्र राठी


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