
इकरार और इजहार के बीच
जो वो एक दयार है
उस मरुस्थल पे
इस कम्बख्त दिल की
एक बेनूर सी मजार है
दर्दे दिल के अनकहे किस्सों से
मैं रोज़ उसे सींचता हूं
गुजरे लम्हों के वाकयात से
मैं शबो रोज़ उन्हें
वक्त के पहिए पे
हौले हौले पीसता हूं
चंद रोज़ पहले दूर देस से
एक बागी परिंदा मेरा हमराज बना
अपने घोंसले, अपने घरोंदे से दूर
वो मेरा हमदर्द हमनवा साथी बना
उस के दर्दो गम से तो
मैं अब भी नावाकिफ हूं
ख़ुदा जाने उसने क्यूं
मुझ जैसे काफ़िर को
अपना हमजोली चुना
आज मैं उसी आज़ाद बागी
परिंदे से मुखातिब हूं
क्या ख्वाब, क्या हसरतें हैं उसकी
जानने को बेतरतीब बेताब हूं
दरख़्तॊं में होगा आशियां उसका
कोई अपना भी रहा होगा ज़रूर
आज फिर मैं उस से रूबरू
मेरा यार वो मेरा मुख्तयार है
उसकी हर आह को
उसकी हर शय को
हज़ार बार सलाम है
हम आशिकों का
बाज़ार ए जहां में
नाम बेशक बदनाम है
ज़माना कहेगा दीवाना
हम दो बेगानों को
ना किसी का इंतजार है
ना ही कोई हमसे बेजार है
दूर तलक नजर ना आता
शहर ना कोई गांव है
इकरार और इजहार के बीच
जो वो एक दयार है
उस मरुस्थल पे
इस कम्बख्त दिल की
एक बेनूर सी मजार है
दर्दे दिल के अनकहे किस्सों से
मैं रोज़ उसे सींचता हूं
गुजरे लम्हों के वाकयात से
मैं शबो रोज़ उन्हें
वक्त के पहिए पे
हौले हौले पीसता हूं।
– पुष्पेंद्र राठी









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